Pathik

जीवन पथ पर
इस कठिन डगर पर
कांटो भरी राहो से
गुजरना जरुरी है
हे पथिक ! तेरे लहू और इस धरा का पवित्र संगम जरुरी है।

साज़िशों के जाल है
तेरे कदमो की ताल से
कइयों के हाल बेहाल है
कश्तियाँ ना मिले, ना सही
डोंगियों के सहारे ही
वैतरणी पार करना जरुरी है
हे पथिक ! तेरे लहू और इस धरा का पवित्र संगम जरुरी है।

वार हज़ारो सहने है
कर्म करते जाना है
जब बुझने लगे लौ
तब नव ज्योति प्रजवल्लन जरुरी है
हे पथिक ! तेरे लहू और इस धरा का पवित्र संगम जरुरी है।

© Neelesh Maheshwari

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फिर वही बात

फिर वही बात,
उस उजड़े चमन की याद,
इन बेरंग अश्को का,
उस सतरंगी वक़्त को सलाम।
फिर वही बात,
उस उजड़े चमन की याद।

काँपती कलम का,
सूखती स्याही का,
इस निस्तेज चाँद का,
उस उगते सूर्य को प्रणाम।
फिर वही बात,
उस उजड़े चमन की याद।

टूटती साँसों का,
रूठती इन्द्रियों का,
उस यशस्वी नवयुवक को,
ये आखिरी पैगाम।
फिर वही बात,
उस उजड़े चमन की याद।

#No Regrets

Copyrights © : Neelesh Maheshwari

 

I Wonder ( In Collaboration)

Hi everyone… I have written this poem in collaboration with Urvashi ( Link Shreds ). A fine poet, her poetry touches me deeply. It was a pleasure to work with her. Hope you enjoy the poem.

In Italics – By Urvashi

I wonder if lie had a face
Yours would have fitted perfectly there
You know If I have to color every hurt
I ever came across because of you 
I would start with black on the edges 
Like the darkness is currently around mine 
And ravish with blue in the middle 
Like the pain in my core feels 
Ends with deep cracks filled with red
Like the emptiness that flows through me

I wonder if emotions were a game 
You would have been the best player at it
If I have to associate a melody to every heartbreak 
I would begin with stating it state of grace 
Make my way with last kiss
And end it all too well
Just like that 1989’s girl once sang 
Heartbreaks wearing a lipstick so red
I recall every moment I spend relating to her lyrics 
Courtesy of your love 
A love that was merely something of love

I wonder if life is just a crooked race
Which we have to complete by any means.
Leaving behind everything we adore
To pursue something we don’t have.
You don’t know how many times
I stopped, just for you.
Because, for me, life is about caring
the jewels we already possess.

I wonder if true love exists.
Because if it does, my heart would not have been shattered
in innumerable pieces, devoid of any hope.
There is nothing Platonic.
For you, it was just a wild ride.
A purely physical pursuit.
For me, it was the essence of life.
I wonder if that’s the difference between you and me.
I wonder…

Photo Credits: Google

Copyrights ©: Urvashi and Neelesh

अधूरे खत

(१)
वो अधूरे खत,
जो शुरू होते हैं,
तुम्हारे नाम से,
आज भी रखे हैं,
मैंने सहेजकर ,
इस उम्मीद में ,
कि शायद उन्हें,
पूरा कर पाऊँ,
एक दिन , और
भेज दूँ , तुम्हे
तुम्हारे पते पर।
और उतार दूँ ,
इस बोझ को ,
अपने सीने से ,
मरने से पहले।

(२)
पर ये कम्बख्त,
कलम की स्याही,
सूख गयी है ,
इन्तजार करते करते।
पर भावनाएं ज़िंदा
हैं अब तक ,
और ले रही है हिलोरे
इस अंतिम घडी में।
सोचता हूँ कि
भेज दूँ मैं
इस अधूरे खत को ही।
शायद, तुम्हारे हाथो को छू
ये पूरा हो जाए।

(३)
आज जवाबी खत ,
आया है मेरी
दहलीज पर।
पर , नाजाने क्यों ,
इसमें वो खुशबु नहीं,
जो है मेरी जानी पहचानी।
एक आभास है,
जैसे घटित हुआ है,
कुछ अनिष्ट ,
इस पल में।

(४)
और अब रख दिया है ,
बिना पढ़े इस खत को,
उसी दराज में ,
जहाँ रखे है ,
मेरे अधूरे खत।
शायद , ये खत
भी अधूरा था ,
जो हो गया है पूरा
मेरे छूने से।
अब मै भी ,
मर सकता हूँ ,
चैन से।

Image Credits : Google

Copyrights © Neelesh Maheshwari ( andaazekalam)

संघर्ष (Part 2)

Check Part 1. Sangharsh (Part 1)

समाज की बेड़ियों ने

जकड़ा हुआ है इस कदर

की उड़ना तो मै भी हूँ चाहती खुले आसमान में

पर होंसला है मेरा पस्त।

 

ऐसा नहीं कि हार मैंने है यूँ ही मानी

खूब लड़ी थी मै भी

उन पुराने खयालातों से

उन दकियानूसी बातों से।

 

कई बार थी गिरी ,

थी हज़ारो ठोकरे खायी।

उठी थी मै हर बार

बढ़ाने को मुक्ति की ये लड़ाई।

 

पर टूट चुकी हूँ मै आज

और स्वीकार करती हूँ अपनी हार।

अब संघर्ष मेरा समाप्त है

इन बेड़ियों में ही मेरा जीवन व्याप्त है।

 

© नीलेश माहेश्वरी

Sangharsh (Part 1)

मिलन

धीमे धीमे सिमट रहा हूँ
तुम्हारी बाहों में।
मिटाकर अपनी शख्सियत
इस मदहोश रात में।

छन छन के आ रही है
चांदनी बादलो से।
और छू रही है
तुम्हारे बदन को, करीने से।

अब सिर्फ एकात्म है।
टूट गयी है सारी परतें।
कोई सीमा नहीं है
अस्तित्व की।

Coprights: Neelesh Maheshwari

Patience

We must note that change happens in society slowly and gradually. We can’t expect things to change overnight. Howsoever enticing the idea of revolution may sound, in reality, it often brings with itself chaos, disorder, and instability. Being a pragmatist, I judge an idea solely on the basis of its actual performance on the ground and not by what it offers in theory.

Look at all the big changes in society. Whether the transition from selective franchise to universal adult suffrage happened in a day? No, it was the result of prolonged struggle of people of various generations.

That is why we must have patience.  We must not lose hope as we can’t see the big change. We must keep looking for small signs of hope.

The same is true for the struggle against patriarchy. It is a long struggle as the roots of patriarchy are very deep. We must know three things if we need to continue our struggle against all odds:

  1. What are we fighting against?
  2. What are we fighting for?
  3. How to fight?

And above all, we need patience. Because we may not see the end result in our lifetime. But, it is our duty to take the struggle forward and so is the duty of next generation.

In my next blog, I will try to deal with above-mentioned questions.

सब्र रख साथी ,
ना मान तू हार।
धीरे – धीरे समाज में,
आ रहा है बदलाव।

चाहे कितना ही लुभावना लगे ,
क्रांति का विचार ,
पर अपने साथ लाता है ये।
अस्थिरता और भूचाल।

कोई भी बदलाव देखो
तुम उठाकर इतिहास ,
आया है वो शनै शनै ,
दशकों के संघर्ष के बाद।

सब्र रख साथी ,
ना मान तू हार।

© Copyrights: Neelesh Maheshwari

सन्नाटा

( 1 )

सन्नाटा पसरा है हर तरफ
इस अँधेरी रात में ।
चाँद भी ज़रा सहमा सा
कहीं छुप गया है।

तारो की चादर भी
हुई छिन्न भिन्न सी है
शायद उन्हें भी अंदेशा है
आने वाले तूफान का।

( 2 )

सब कुछ खत्म हो गया है,
अब बची नहीं कोई उम्मीद,
हर तरफ विलाप ही विलाप,
सन्नाटा टूट चुका  है।
हमारा प्यारा आशियाना,
उजड़ चुका है।

इस गमगीन घडी में
आंसू बहा रहा है
आसमान भी।

© Copyrights : Neelesh Maheshwari

गलती मेरी है।

होली का त्यौहार आया है।
आप सभी को ढेर सारी बधाई।

हर जगह होली पर कविताये है।
बधाई के सन्देश है।
सभी बहुत सुन्दर।

एक बार लगा की ये पोस्ट नहीं करूँ।
आखिर , महफ़िल जमी हुई है।
क्यों रंग में भंग डाला जाये।
पर, फिर अपने को रोक नहीं पाया।

ट्रेवल ब्लोग्स पढ़ने का शौक है।
अभी पिछले साल एक video ब्लॉग होली के बाद पढ़ा। Link
जिसमे ब्लॉगर , जो कि एक विदेशी लड़की थी, ने अपने साथ इस पावन पर्व पर हुए दुर्व्यवहार की वीडियो शेयर की थी।
अब इस साल दिल्ली में सीमेन से भरे गुब्बारे फेंके जा रहे है।
खैर, मुझे ज्यादा उदहारण देने की जरुरत नहीं है।
होली के दिन घर से बाहर निकलना कितना सुरक्षित है ,
ये आप सब जानते ही है।

इस दिन तो जैसे लाइसेंस ही मिल जाता है दुर्व्यवहार का ,
क्योंकि बुरा न मानो , होली है।
ठीक वैसे ही , जैसे शादी के बाद लाइसेंस मिल जाता है
बिना consent शारीरिक सम्बन्ध बनाने का। Link ( Section 375 exception clause)
क्योंकि , शादी एक पवित्र बंधन है।
Marital rape तो केवल एक काल्पनिक शब्द है !
ऐसा कुछ होता ही नहीं है।
खैर, इस मुद्दे को बाद में अलग से discuss  करेंगे।

होली पर कविता मैंने भी लिखी थी।
पर, अब शेयर करने का मन नहीं है।

खैर, चार लाइन्स है.

बचपन से ही सिखाया है मुझे
– गलती मेरी है।
कोई घूरे , कोई टच करे
कोई पीछे आये , कोई अश्लील कमेंट करे।
सब गलती मेरी है।

अरे ! लड़के तो घूरेंगे ही
कपडे देखे है इसके।

देर शाम बाहर निकलोगी ,
लड़के तो छेड़ेंगे ही न।

अरे ! अगर इतना हंसोगी ,
तो लड़के तो पीछे आएंगे ही।
आखिर , लड़की हंसी , तो फँसी।

Anyways, बात कुछ भी हो ,
गलती तो मेरी ही है ना।
Simple सा लॉजिक है
अरे भाई ! लड़की हूँ एक पितृसत्तात्मक समाज में।
इससे बड़ी गलती और क्या होगी।
I accept, गलती मेरी है।

Image Credits: Google

© Copyrights: Neelesh Maheshwari

 

चंद लम्हे ही है शेष

चंद लम्हे ही है शेष
अब तुम्हारे जाने में।

जी करता है,
थाम लूँ तुम्हारा हाथ,
और रोक दूँ समय को,
पर , अपने आप को असमर्थ पाता हूँ।
कुछ कहने को होता हूँ ,
पर , बीच में ही रूक जाता हूँ।

जानता हूँ भली – भांति
कि यही वक़्त का तकाजा है।
फिर भी, नाजाने क्यों
नए नए बहाने ढूंढ लाता हूँ।

तुमसे जुदाई की,
कल्पना भी नहीं कर पता हूँ।

Image Credits : Google

© Copyrights : Neelesh Maheshwari

प्रहार करो

प्रहार करो, प्रहार करो
पितृसत्ता की जड़ो पर
आज तुम आघात करो।

खूब सहा है अत्याचार
अब, और न तुम इंतजार करो
काली का तुम रूप धरो
शिव का तांडव रचो।
प्रहार करो, प्रहार करो
पितृसत्ता की जड़ो पर
आज तुम आघात करो।

बेड़ियों को तोड़ दो
मुक्ति का आह्वान करो
पुरातनपंथी ख़्यालों का
आज तुम संहार करो।
प्रहार करो, प्रहार करो
पितृसत्ता की जड़ो पर
आज तुम आघात करो।

कठिन इस कार्य को
आज तुम अंजाम दो
प्रलयंकारी युद्ध करो
फिर एक नया आगाज करो।
प्रहार करो, प्रहार करो
पितृसत्ता की जड़ो पर
आज तुम आघात करो।

Image Credits: Google

© Copyright: Neelesh Maheshwari